Tuesday, September 8, 2015

रेत घर

स्वप्न में मैं किसी ऐसे द्वीप पर थी
जहाँ शिलाएँ इतनी चिकनी थीं
कि मुश्किल था पाँव के तलवों का टिक पाना

मेरी देह अंतरिक्ष में उड़ते
किसी यान की तरह बह रही थी

ईश्वर मौजूद नहीं था वहाँ
जिसे अपनी नाराज़गी जता सकती

मेरी हथेली में हल्के गुलाबी रंग की एक सीप थी
जिसे एक रेशमी धागे से बाँध रखा था मैंने

जाने क्या था उसमें
क्यों बाँध रखा था मैंने

मैं किसी नीले टुकड़े की तलाश में थी
जिसमें लहरें एक ताल पर आती-जाती हैं

पर किनारे पर बिछी  रेत को छूती नहीं
इस तरह किनारे पर बने रेत घर
आबाद रहते हैं हमेशा

एक लम्बी यात्रा के बाद
आख़िर वो नीला टुकड़ा दिखा

मैंने उस गुलाबी सीप को खोला
ख़ाली थी वो
क्यूंकि मुझे उन लहरों में से
बस एक लहर भरनी थी उसमें

ताकि मेहफ़ूज़ रह सके पृथ्वी पर
हर एक रेत घर
---------------
आरती  



No comments:

Post a Comment