चल ना हाथ थामे चलते हैं वहाँ
जहाँ सुबह के कंधों पर बेफ़िक्री के बस्ते हों
आँसू महँगे और मुस्कान सस्ती हो
जहाँ ठेले पर बिकता हो बीता बचपन
ऊँगली से बंधे हों शरारतों के गुब्बारे
जहाँ भले सिक्कों से हों जेबें ख़ाली
हौंसले तने हों, चाल मतवाली
जहाँ शाम गिरती हो उसके काँधे पर
बेचैन हथेलियाँ मिलती हों किनारे पर
जहाँ रात घटने पर ना घटते हों सपने
खट्टे या मीठे हों सब हो चखने
जहाँ चाँद की छत पर लेटकर हों ढेरों बातें
आँखों - आँखों में सही, हो मुलाक़ातें
चल ना हाथ थामे चलते हैं वहाँ……
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आरती
जहाँ सुबह के कंधों पर बेफ़िक्री के बस्ते हों
आँसू महँगे और मुस्कान सस्ती हो
जहाँ ठेले पर बिकता हो बीता बचपन
ऊँगली से बंधे हों शरारतों के गुब्बारे
जहाँ भले सिक्कों से हों जेबें ख़ाली
हौंसले तने हों, चाल मतवाली
जहाँ शाम गिरती हो उसके काँधे पर
बेचैन हथेलियाँ मिलती हों किनारे पर
जहाँ रात घटने पर ना घटते हों सपने
खट्टे या मीठे हों सब हो चखने
जहाँ चाँद की छत पर लेटकर हों ढेरों बातें
आँखों - आँखों में सही, हो मुलाक़ातें
चल ना हाथ थामे चलते हैं वहाँ……
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आरती
बहुत ही खुबसूरत...
ReplyDeletedhanyawad Saurabh..
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