कभी मन होता है
समय की अनवरत बहती धारा को
रेत की बाड़ से रोक दूँ
मुस्कुराऊँ फ़िर
रेत को क़तरा क़तरा पानी में घुलते देखकर
कभी मन होता है
समंदर की गोद में पाँव रखे
बैठी रहूँ नदी की तरह
बुदबुदाऊं अनकहा
और समंदर हो जाऊं
कभी मन होता है
कैनवास पर यूँ ही बिखेर दूँ सारे रंग
फ़िर ढूँढूँ
अपने - उसके बीच का रंग
कभी मन होता है
स्मृति की भूरी हथेली पलटकर
रख दूँ आँख से गिरी अदनी-सी पलक
और मांग लूँ एक बार फ़िर…
प्रेम के हरे दिन
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आरती
समय की अनवरत बहती धारा को
रेत की बाड़ से रोक दूँ
मुस्कुराऊँ फ़िर
रेत को क़तरा क़तरा पानी में घुलते देखकर
कभी मन होता है
समंदर की गोद में पाँव रखे
बैठी रहूँ नदी की तरह
बुदबुदाऊं अनकहा
और समंदर हो जाऊं
कभी मन होता है
कैनवास पर यूँ ही बिखेर दूँ सारे रंग
फ़िर ढूँढूँ
अपने - उसके बीच का रंग
कभी मन होता है
स्मृति की भूरी हथेली पलटकर
रख दूँ आँख से गिरी अदनी-सी पलक
और मांग लूँ एक बार फ़िर…
प्रेम के हरे दिन
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आरती
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