तुम्हारे कुर्ते में कलफ की तरह चढ़ना चाहती हूँ
रुमाल के कोर पर नाम की तरह कढ़ना चाहती हूँ
तुम्हारी मेज़ पर जलती मोम की तरह पिघलना चाहती हूँ
अधूरी नज़्म में मिसरा बन मुक़म्मल होना चाहती हूँ
तुम्हारी किताब के सफ़होँ के बीच रखा गुलाब बनना चाहती हूँ
सूखे हलक में पानी की पहली बूँद सी समाना चाहती हूँ
तुम्हारे बालों को सबा बन सहलाना चाहती हूँ
पाँव में मुलायम दूब की तरह बिछना चाहती हूँ
तुम्हारे आईने में स्मृति बन झिलमिलाना चाहती हूँ
पलकों पर मिश्री से ख़्वाब सा ठहरना चाहती हूँ
तुम्हारे दुआ में उठे हाथों में दायीं हथेली बन जुड़ना चाहती हूँ
चाँद के सबसे करीब का तारा बन निहारना चाहती हूँ
मैं तुम्हारी कुछ न होकर भी.…बहुत कुछ होना चाहती हूँ………
----------------------------------------------------
आरती
(१४/५/१४)
रुमाल के कोर पर नाम की तरह कढ़ना चाहती हूँ
तुम्हारी मेज़ पर जलती मोम की तरह पिघलना चाहती हूँ
अधूरी नज़्म में मिसरा बन मुक़म्मल होना चाहती हूँ
तुम्हारी किताब के सफ़होँ के बीच रखा गुलाब बनना चाहती हूँ
सूखे हलक में पानी की पहली बूँद सी समाना चाहती हूँ
तुम्हारे बालों को सबा बन सहलाना चाहती हूँ
पाँव में मुलायम दूब की तरह बिछना चाहती हूँ
तुम्हारे आईने में स्मृति बन झिलमिलाना चाहती हूँ
पलकों पर मिश्री से ख़्वाब सा ठहरना चाहती हूँ
तुम्हारे दुआ में उठे हाथों में दायीं हथेली बन जुड़ना चाहती हूँ
चाँद के सबसे करीब का तारा बन निहारना चाहती हूँ
मैं तुम्हारी कुछ न होकर भी.…बहुत कुछ होना चाहती हूँ………
----------------------------------------------------
आरती
(१४/५/१४)
No comments:
Post a Comment