Friday, October 25, 2013



 


ख्व़ाब आँखों में क़ैद किसी क़ैदी से लगते हैं
पलकों की सलाखों के पीछे दुबके हुए, कभी सहमे हुए से

कई रतजगी काटी हैं दोनों ने साथ-साथ
कभी ख़्वाबों ने तो कभी आँखों ने थपकी दे कर
कि सो जा अब रात भी थक चली है

पर ये ठीठ-से ख़वाब अपना कन्धा उचकाते हैं
मुंह बनाकर जीभ चढ़ाते हैं ,कभी आते ही नहीं तो कभी आ कर जगाते हैं

कभी आते ही नहीं तो कभी आ कर जगाते  हैं......


(आरती)


 

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