Tuesday, July 5, 2016

एक बादल पानी वाला

अमलतास के झूमर से टपक कर 
कुछ बूँदें बारिश की 
भर जाती हैं भीतर भी... 
गीले मन से झरते हैं पीताम्बरी फ़ूल
कोई नहीं देख पाता उनका गिरना 
पांव के पीछे एड़ी से चिपके अकेलेपन के ठीक पास 
बनता है एक बादल पानी वाला 
जो फूटता नहीं है भरता रहता है 
हर गुज़रती सांस के साथ...
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आरती

Saturday, June 25, 2016

दो किनारों के बीच का संवाद

रसोई के आले में रखकर भूल जाती हैं वो अक्सर
उदासी के मर्तबान को धूप दिखाना 
उन काँच के मर्तबानों में पकती है उदासी 
एक दिन देखना वो दरक जाएँगे और बह निकलेगी एक उफनती नदी 
उसे समंदर में समाने की चाह न होगी 
वो तो बस संवाद बन जाना चाहेगी
दो किनारों के बीच का...
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आरती

Wednesday, June 22, 2016

एक और नज़्म....

बुझती हुई आँखों में जैसे 
मुस्कुराहट की डली है कोई 
पिघलती है कभी खारी होकर 
तो कभी ठहरे मर्ज़-सी...नब्जों में उतर आती है 
मैं पूछती हूँ आख़िर दर्द क्या है? तेरा मर्ज़ क्या है ? 
हर दफ़ा वो हौले से एक गेंद उछालती है
जो लुढ़क जाया करती है आँख के पाले से
और दर्ज मिलती है रुमाल के सफ़हे पर
एक और नज़्म....
गीले काजल की... 

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आरती

Wednesday, June 1, 2016

चुप्पी का अनुवाद

प्रेम में होना 
असल में उन्मुक्क्त होना है 
एब्स्ट्रैक्ट पेंटिंग की तरह...
जहाँ चीज़ों के ख़ाके तय नहीं होते 
दरअसल ख़ाके हमें बाँधते नहीं, तोड़ते हैं। 
टूटन को स्थगित करना, हमें ज़रा और तोड़ता है।
जैसे शब्दों के स्थगन से जन्मी चुप्पी को
होठों से चूमना और उसके मोह में पड़ जाना
हमें निर्मोह कर देता है, शब्दों से
एक प्रश्नचिन्ह के साथ :
क्या शब्दों में किया जा सकता है
चुप्पी का अनुवाद !
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आरती

Friday, May 27, 2016

बस एक हल्की थपकन

मन बिल्ली के पंजों से खुरची
गेंद की तरह लगता है कभी
जिसे खुद आपने बिल्ली को थमाया हो
ताकि सुन्न पड़ चुकी वो चीज़ खुरचन से फ़िर जी उठे
हम जैसे अपनी ही क़ैद में गुज़र करते हैं
जबकि ये सज़ा भी हम ही ने मुक़र्रर की है
ये क़ैद, प्रेम की क़ैद है
'प्रेम' कितना छोटा-सा शब्द है
उसकी पीठ उतनी ही लम्बी
हज़ार खरोंचें और एक सख़्त पीठ
पर जानते हो बस एक हल्का बोसा
बस एक हल्की थपकन काफ़ी है इसपर
फ़िर मुड़कर देख पाने के लिए...
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आरती



  

Saturday, May 21, 2016

जीवन की सांत्वना

अपने-अपने अँधेरों में गुम 
उजास की अास लिए
खुद के छितरे हुए आश्वासन को बटोरती
कविता कुछ और नहीं
जीवन की सांत्वना है... 
(आरती)

Monday, April 25, 2016

मेरे हिस्से की कहानी

बहुत - सा धुँआ और गर्द 
स्मृति की पीठ पर जमी खरोंच होती है 
जो आहिस्ता - आहिस्ता सोखती रहती है... 
उसकी तरलता 
ऐसे में मैं किसी द्वंद्व से गुज़रती हूँ 
जहाँ हर क्षण जीना, मरना ही है।
ढेर- सी चुप आवाज़ें भाप की तरह
मेरे भीतर उठती हैं
और फ़िर पर- कटे पक्षी की तरह
अपनी उड़ान खो देती हैं।
तुम, जिसको अब मेरी आवाज़ भी नहीं छूती
मैं चाहती हूँ तुम्हारे लिए अनजानी ही रह जाए
मेरे हिस्से की कहानी
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आरती