Tuesday, October 25, 2016

नाविक

आँख में सफ़ेद धुंध भरे
वो पीली धूप के स्वप्न बुनती है
पीड़ा के छिटके कणों को दोनों हाथों से समेटे
प्रेम के चेहरे पर जोड़ती जाती
हाँ और क्या करोंच सकी है वो उसमें
पीड़ा ही तो मन की प्रेरणा है
उसके और अपने बीच वो बस एक धुन सुन सकती है
माउथ ऑर्गन की उदास धुन
जो उसे किसी समुद्री यात्रा पर ले जाती है
उस क्षण उसके प्रेम का चेहरा नाविक बन जाता
जो दबे होठों से गुनगुनाता,"लड़की को नाविक से प्रेम है, है न!"
और वो पुतलियों में समंदर लिए अभिभूत हो जाती
कितना सुन्दर है ये दृश्य
प्रेम की सबसे सुखद अनुभूति
पर ये दृश्य स्मृति में टंका एक स्वप्न बन जाता है
जो उसने कभी जिया नहीं
उसे याद आता है उन आँखों में उसके लिए 'कुछ' नहीं
'कुछ' भी तो नहीं...
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आरती

Sunday, October 2, 2016

वो लम्स

कह दे और चुप भी रहे
खो गया जो आँखों का
वो लम्स लौटा दे
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आरती

Thursday, September 22, 2016

तुम्हे खुद ही रचना है अपना इतिहास

कस कर भींच लो गुलाबी मुट्ठी में
ख़्वाब कोई आसमानी
नाप लो तुम अपने छोटे पंखों से
धरा और नीले टुकड़े की दूरी
सुनो तलवों में जो चुभन-जलन है न
उसे मिटने-बुझने न देना
कंधे पर रखे किसी हाथ से
न हो जाना तुम आश्वासित
तुम्हे खुद ही बनना है अपना आश्वासन
देखो आँचल में बंधी गाँठ में तुम करुणा प्रेम संवेदना के साथ
रख लेना कुछ बीज आत्मसम्मान और निष्ठा के
ताकि बनी रहे भीतर की अग्नि में ताप
किसी की स्वीकृति पर नहीं निर्भर है तुम्हारा जीवन
ना किसी की अस्वीकृति पर तुम्हारा अंत
कि तुम्हे खुद ही रचना है अपना इतिहास
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आरती

ख़िज़ाँ

दरख़तों को चाह थी गुलों की
ख़िज़ाँ ने बो दिए काँटे
अब हथेलियाँ दुखती हैं
(आरती)

Monday, August 1, 2016

बेपर चिड़िया है प्रेम

कोरे कैनवस पर उड़ती
बेपर चिड़िया है प्रेम
जिसके लिए उसका कोरापन ही
एक मुकम्मल पेंटिंग है...
(
आरती)

Tuesday, July 5, 2016

एक बादल पानी वाला

अमलतास के झूमर से टपक कर 
कुछ बूँदें बारिश की 
भर जाती हैं भीतर भी... 
गीले मन से झरते हैं पीताम्बरी फ़ूल
कोई नहीं देख पाता उनका गिरना 
पांव के पीछे एड़ी से चिपके अकेलेपन के ठीक पास 
बनता है एक बादल पानी वाला 
जो फूटता नहीं है भरता रहता है 
हर गुज़रती सांस के साथ...
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आरती

Saturday, June 25, 2016

दो किनारों के बीच का संवाद

रसोई के आले में रखकर भूल जाती हैं वो अक्सर
उदासी के मर्तबान को धूप दिखाना 
उन काँच के मर्तबानों में पकती है उदासी 
एक दिन देखना वो दरक जाएँगे और बह निकलेगी एक उफनती नदी 
उसे समंदर में समाने की चाह न होगी 
वो तो बस संवाद बन जाना चाहेगी
दो किनारों के बीच का...
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आरती