Wednesday, October 24, 2018

फिलर

रंगों से सने पैलेट को देख
उँगलियों को तलब लगती है
ब्रश थाम लेने की
कभी जब खनकने लगती हैं
विंड चाइम में पिरोई सीपियाँ
उतरने लगती है हथेली में
समंदर की वो पहली छुअन
ब्लैक कॉफ़ी में ब्रश डुबोकर
उस दिन उकेरा था अपना नाम
तुम्हारे कुर्ते पर
धुलेगा तो छूट जाएगा रंग
नाम न मिटेगा मन से...तुमने कहा था
कभी मुड़कर देखूं तो ये रंग,छुअन,तुम्हारा कहा
सब बेमानी लगता है
जैसे किसी कहानी में गढ़े हों किरदार बिना वजूद वाले
या रेडियो में समय भरने के लिए कोई फिलर
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आरती

Wednesday, January 3, 2018

वो और मैं

वो, लम्हा था, ग़ुज़र गया 
मैं, याद थी, बनी रही... 
(आरती)


Sunday, December 3, 2017

जो छूटा है ...

बहुत बार हम तेज़ चलते हैं
और भूल जाते हैं रुकना
जब कभी याद आता है रुकना
तो अक्सर चलना ही भुला देते हैं
कभी चलो, तो ज़रा रुक के चलो न
ज़रा ज़रा चलना , ज़रा ज़रा रुकना
पता है, इस चलने और रुकने के बीच
जो छूटा है फ़िर समेट भी सकते हैं...
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आरती

Tuesday, August 29, 2017

अनवरत

तुम्हारा लिखा पढ़ना 
ख़ुद से बातें करने जैसा है
तुम्हे पढ़ते हुए 'मैं' और 'तुम' का भेद मिट जाता है 
कुछ उगता है भीतर शायद एक नन्हीं-सी कोंपल 
जो उदासी के भूरेपन को हरा कर देती है 
प्रेम का सदाबहार फ़ूल अपनी महक को नहीं आने देता
मन की जिल्द से बाहर
किसी अनसुलझे दुःख की तरह बना रहता है सुख में भी अनवरत...
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आरती

Monday, July 31, 2017

याद

जहाँ - जहाँ भी याद रखी है 
वहाँ - वहाँ जमा है एक बादल...पानी वाला 
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आरती

Tuesday, July 11, 2017

स्वप्नयात्रा

समय के परों पर तैरते 'तुम'
कुछ देर ठहरे थे मेरे पास
कुछ कहा था तुमने या शायद तुम्हारा 'चुप' ही बोला था :
"तुम्हारा कुछ न कहना, सब कहना है 
मेरा कुछ न सुनना, सब सुनना"
प्रेम है... यहीं है... दो 'मन' के बीच
अदृश्य में भी अपनी मौजूदगी दर्ज कराता...
प्रेम का मर्म शायद यही है
स्वप्न और यथार्थ से परे उस क्षण में
मैंने बंद पलकों से छुए थे तुम्हारे माथे के टाँके...
ब्राइल लिपि की तरह
ठीक उसी क्षण आरंभ हुई एक आंसू की स्वप्नयात्रा
जो भोर में बारिश हो गया था।
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आरती