Monday, November 9, 2015

सफ़ेद गुड़हल

मुझे किसी वनकन्या के बालों में लगा
सफ़ेद गुड़हल होना था
उन्मुक्त, हवा में सांस लेता हुआ
क्यों मुझे किसी कवि की आँख का 
स्वप्न बनाया
पथराया, कोर में अटका हुआ
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आरती

Monday, November 2, 2015

संजीवनी प्रेम की

गहरे नीले और स्याह रंग में 
बस छटाँक भर का अंतर होता है 
उस छटाँक भर में 
जो कुछ अंश श्वेत का है 
दरअसल वही संजीवनी है 
प्रेम की...
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आरती

Sunday, November 1, 2015

तुम्हारा स्वर

तुम्हारा स्वर
जैसे राग मल्हार
शायद यही है
तुम्हे न सुनने की वजह
(आरती

Monday, October 19, 2015

स्मृतिशेष

कुछ न बचकर भी
कुछ तो बचता ही है
बैंगनी से कासनी होने की यात्रा है
स्मृतिशेष
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आरती 

Wednesday, October 14, 2015













जब तक दरवाज़े हैं
बची रहेगी संभावना
आवाजाही की
-आरती