जज़्बातों का दरिया, लफ़्ज़ों के लिबास.....
मैं बस अहसास लिखती हूँ। शब्द महज़ लिबास भर हैँ।
Wednesday, January 28, 2015
बारिश
बारिश देखना,
तुमसे बातेँ करने जैसा है..
तुम्हारी धुन पे अपने लफ़्ज़ बुनने जैसा है...
-आरती
..
Wednesday, January 7, 2015
मीठा भ्रम
पहाड़ की बेरूख़ी
नदी के लिए सज़ा है…
प्रेम की।
प्रेम, जो नदी की अनुमति लेकर
उस तक नहीं पहुँचा था
नहीं जानती थी नदी
प्रेम के मायने
कैसे संभाले उसे....
कभी पास बिठाती
कभी लिटा देती
जैसे कोई पेंटिंग बना रही हो।
पर पहाड़ के लिए प्रेम का कैनवास…
कोरा है
और नदी के लिए
मीठा भ्रम।
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आरती
Monday, December 22, 2014
अलाव
सोचती हूँ
कभी कह पाऊँगी तुमसे
जो अब तक हऴक मेँ अलाव लिए बैठी हूँ..
-आरती
Sunday, December 21, 2014
संवाद
तुम्हारे - मेरे बीच
कोई बात नहीं
सवाल नहीं
जवाब नहीं
बिना बोले भी तो बातें
हुआ करतीं हैं न …
मेरी नज़्मों, रंगों में उसका चेहरा
ताक़ीद करते हैं इस बात की.…
ख़ामोश लफ्ज़ भी संवाद रचा करते हैं।
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आरती
Tuesday, December 9, 2014
सबब
तुम्हारी आँखें देखीं
तब जाना समंदर के ख़ारे होने का सबब
सच! समंदर खारा होता है और खरा भी.....
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आरती
मंज़िल की तलब
Monday, December 1, 2014
प्रेम
प्रेम, कब अल्फ़ाज़ोँ का मोहताज हुआ है..
वो तो परवान चढ़ता है पीड़ा के सबसे गूंगे क्षणोँ मेँ।
-आरती
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