Wednesday, June 7, 2017

दो मन

दो मन के सिरे बंधे हैं 
एक चुप की तार से
वो कभी नहीं कह पाएगी वो कभी नहीं सुन पाएगा 
दोनों कविता में जीते हैं कहते हैं 
दरअसल कविता में जीना ही उनका स्वभाव है 
वायलिन के मध्य लय फिर द्रुत लय पर थिरकते हैं उदासी के पांव
जो गेंद बनकर टप्पे खाती रहती मन के दोनों पालों के बीच
ध्यान से देखो तो कुछ बंधा दिखेगा चेहरे पर टंगी
उन बादामी आँखों में....
एक में बारिशें दूसरी में सवाल :
क्या कभी पढ़ सकोगे वो पनीली आँखें !
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आरती

Sunday, February 5, 2017

विराम

प्रेम के पोरों का स्पर्श उसका स्वप्न है
वो कुतरती रहती समय की फांक को
गिलहरी की तरह थोड़ा-थोड़ा
फिर भी उसकी पुतलियों की उदासी
विस्तृत होती जाती
सांसों के स्पंदन पर थिरकती रहती
निरंतर...उसकी आकुलता
वो प्रार्थनाओं के द्वार पर सीली आँखें लिए
बुदबुदाती रहती :
'उसकी प्रतीक्षा को विराम मिले'
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आरती

Friday, February 3, 2017

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Tuesday, January 3, 2017

आलाप

उसे कहना नहीं आया
वो महसूसती और लिखती।
वो पढ़ता, महसूसता और
चुप रहता।
मौन के इस आलाप में
शब्द अपनी ध्वनियाँ तलाशते रहते
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आरती

Sunday, December 11, 2016

अबोला

उसे बोलने से परहेज़ नहीं था
चाह बस इतनी भर थी
कोई अबोला भी सुन सके
(आरती)

Tuesday, October 25, 2016

नाविक

आँख में सफ़ेद धुंध भरे
वो पीली धूप के स्वप्न बुनती है
पीड़ा के छिटके कणों को दोनों हाथों से समेटे
प्रेम के चेहरे पर जोड़ती जाती
हाँ और क्या करोंच सकी है वो उसमें
पीड़ा ही तो मन की प्रेरणा है
उसके और अपने बीच वो बस एक धुन सुन सकती है
माउथ ऑर्गन की उदास धुन
जो उसे किसी समुद्री यात्रा पर ले जाती है
उस क्षण उसके प्रेम का चेहरा नाविक बन जाता
जो दबे होठों से गुनगुनाता,"लड़की को नाविक से प्रेम है, है न!"
और वो पुतलियों में समंदर लिए अभिभूत हो जाती
कितना सुन्दर है ये दृश्य
प्रेम की सबसे सुखद अनुभूति
पर ये दृश्य स्मृति में टंका एक स्वप्न बन जाता है
जो उसने कभी जिया नहीं
उसे याद आता है उन आँखों में उसके लिए 'कुछ' नहीं
'कुछ' भी तो नहीं...
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आरती

Sunday, October 2, 2016

वो लम्स

कह दे और चुप भी रहे
खो गया जो आँखों का
वो लम्स लौटा दे
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आरती